उत्तर प्रदेश

जज को फोन कर दबाव बनाने के आरोपों पर आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल की सफाई

Kavita2
25 Aug 2026 9:13 AM IST
जज को फोन कर दबाव बनाने के आरोपों पर आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल की सफाई
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उत्तरप्रदेश : जज को फोन कर एक लंबित सरकारी जमीन के मामले में दबाव बनाने के आरोपों से घिरीं आईएएस अधिकारी और मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल की ओर से भी सफाई सामने आई है। न्यायिक अधिकारी की ओर से लगाए गए आरोपों और उसके बाद शुरू हुई अवमानना की कार्यवाही के बीच नागपाल ने कई आरोपों से इनकार किया है। उनका कहना है कि फोन पर बातचीत का उद्देश्य किसी न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करना नहीं था, बल्कि सरकारी जमीन से जुड़े लंबित मामले में प्रभावी पैरवी सुनिश्चित करना था।

नागपाल की ओर से स्पष्ट किया गया है कि फोन पर न तो मामले के गुण-दोष को लेकर कोई चर्चा हुई और न ही किसी आदेश अथवा फैसले के संबंध में बात की गई। उन्होंने यह भी कहा कि बातचीत के दौरान न तो केस संख्या बताई गई और न ही केस का नाम लेकर कोई चर्चा हुई। ऐसे में फोन पर हुई बातचीत को न्यायिक निर्णय को प्रभावित करने के प्रयास के रूप में देखना उचित नहीं है।

दरअसल, यह पूरा मामला सरकारी जमीन से जुड़े एक लंबित विवाद को लेकर सामने आया है। आरोप है कि मंडलायुक्त ने मामले की सुनवाई कर रहे जज को फोन कर प्रभाव डालने का प्रयास किया। न्यायिक अधिकारी ने इस संबंध में अपनी रिपोर्ट/पत्र में बातचीत को लेकर गंभीर आरोप लगाए। इसके बाद मामला अवमानना की कार्यवाही तक पहुंच गया और प्रशासनिक गलियारों से लेकर न्यायिक हलकों तक इसकी चर्चा शुरू हो गई।

न्यायिक अधिकारी के पत्र में फोन कॉल को लेकर कई बातें दर्ज की गई थीं। इन्हीं आरोपों के आधार पर मंडलायुक्त की भूमिका पर सवाल उठे। मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ गई क्योंकि आरोप सीधे एक न्यायिक अधिकारी से संपर्क कर लंबित मामले में प्रभाव डालने से जुड़े थे। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता के लिहाज से ऐसे आरोपों को गंभीर माना जाता है।

हालांकि, अब मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल की ओर से अपना पक्ष रखा गया है। उनकी सफाई के मुताबिक, सरकारी जमीन से जुड़े मामले में प्रशासन का पक्ष मजबूती से रखना और उसकी प्रभावी पैरवी करना ही बातचीत का उद्देश्य था। उनका कहना है कि किसी भी स्तर पर न्यायिक अधिकारी पर फैसला देने या किसी विशेष आदेश को पारित करने के लिए दबाव डालने की मंशा नहीं थी।

नागपाल ने फोन पर केस के गुण-दोष पर चर्चा किए जाने के आरोप से भी इनकार किया है। उनका कहना है कि बातचीत में मामले की कानूनी merits पर कोई चर्चा नहीं हुई। इसी तरह उन्होंने किसी आदेश या फैसले के संबंध में बातचीत होने की बात को भी गलत बताया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बातचीत में केस नंबर अथवा केस का नाम तक नहीं लिया गया।

मंडलायुक्त की इस सफाई के बाद अब मामला दो अलग-अलग पक्षों के दावों के बीच खड़ा दिखाई दे रहा है। एक ओर न्यायिक अधिकारी की ओर से फोन कॉल और कथित दबाव को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं, वहीं दूसरी ओर आईएएस अधिकारी ने उन आरोपों से इनकार करते हुए इसे सरकारी पक्ष की प्रभावी पैरवी से जुड़ी बातचीत बताया है।

मामले में सबसे अहम सवाल अब यही है कि फोन पर वास्तव में क्या बातचीत हुई थी और उसका उद्देश्य क्या था। यदि बातचीत में किसी न्यायिक आदेश या फैसले को प्रभावित करने का प्रयास साबित होता है तो मामला गंभीर हो सकता है। वहीं, यदि बातचीत केवल प्रशासनिक पक्ष की पैरवी तक सीमित थी और उसमें न्यायिक निर्णय को प्रभावित करने का कोई प्रयास नहीं हुआ, तो आरोपों की प्रकृति अलग होगी।

अवमानना की कार्यवाही के संदर्भ में भी यही सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि संबंधित अधिकारी का आचरण न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप की श्रेणी में आता है या नहीं। अदालत इस मामले में उपलब्ध तथ्यों, संबंधित अधिकारियों के पक्ष और न्यायिक अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय कर सकती है।

दुर्गा शक्ति नागपाल की सफाई ऐसे समय आई है जब न्यायिक अधिकारी के आरोपों ने प्रशासनिक व्यवस्था और न्यायपालिका के बीच संबंधों को लेकर बहस छेड़ दी है। सरकारी अधिकारियों की ओर से न्यायिक मामलों में पैरवी करना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन न्यायिक अधिकारी से सीधे संपर्क और बातचीत का तरीका विवाद का विषय बन सकता है।

फिलहाल मंडलायुक्त की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि उनका मकसद न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करना नहीं, बल्कि सरकारी जमीन के लंबित मामले में प्रभावी पैरवी करना था। उन्होंने न्यायिक अधिकारी के पत्र में दर्ज कई आरोपों को गलत बताया है। अब इस मामले में अदालत के सामने दोनों पक्षों के दावों और उपलब्ध तथ्यों की जांच अहम होगी। अवमानना की कार्यवाही में आगे होने वाली सुनवाई से यह स्पष्ट हो सकेगा कि फोन पर हुई बातचीत को न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप माना जाता है या प्रशासनिक पैरवी के दायरे में रखा जाता है।

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